গাঁয়ের ওপর গুলি কে চালায়
- প্রতিরোধের ভাষা

- Sep 24, 2021
- 2 min read
জেসিন্তা কেরকেট্টা

[ জসিন্তা ঝাড়খণ্ডের কবি। সিংভূমের ওঁরাও জনগোষ্ঠী থেকে উঠে আসা এই মেয়ে আজকে দেশে ও দেশের বাইরেও প্রতিবাদী কবিতার এক আলোচিত মুখ। জসিন্তা লেখেন হিন্দিতে, লেখেন আদিবাসী জনসমাজের যন্ত্রণা আর তাদের সংগ্রাম নিয়ে। সত্যিকথা লেখেন।
জসিন্তা কেরকেট্টার সাম্প্রতিক এই কবিতাটি ছত্তিসগড়ের সুকমায় পুলিশ ক্যাম্পের বিরুদ্ধে আন্দোলনরত তিনজন আদিবাসীকে ও মহারাষ্ট্রের গঢ়চিরোলিতে ১৩ জন মাওবাদী বিপ্লবীকে 'ফেক এনকাউন্টার' হত্যার প্রেক্ষিতে আমাদের অত্যন্ত প্রাসঙ্গিক মনে হয়েছে। তাঁর প্রকাশিতব্য কবিতাসংগ্রহ "ঈশ্বর ও বাজার" থেকে নেওয়া কবিতাটির বাংলা অনুবাদ আমরা প্রকাশ করলাম। মূল হিন্দি পাঠটিও সঙ্গে রইল। ]
গাঁ রাত্তিরে বিছানায় শুয়ে পড়ে
কিন্তু ওর ঘুমের সাথে
এখন কোনো স্বপ্ন নেই
গত রাত্রে সব স্বপ্নকে বন্দী করে
জেলে ভরা হয়েছে
যেখানে স্বপ্ন গজানোর সম্ভাবনা ছিলো
সেখানে ব্যাঙের ছাতার মতো গজিয়েছে ছাউনি
দিন আর রাত অদ্ভুত আতঙ্কে কাটাচ্ছে
গাঁয়ের আদিবাসী ছেলে
কখনো স্বপ্ন দেখতো নিজের মাটিকে সেবা করার
মাঝরাতে জেগে উঠে
এখন স্বপ্নে দেখে ঘাতক বন্দুকেরা
ওর নিদ্রা ভরে আছে
অনেক দুর্ঘটনার স্মৃতিতে
মাঝরাতে ও জেগে উঠে
নিজের মুখ মোছে
থেকে থেকে যেন মনে হয়
কেউ যেন বন্দুকের কুঁদো ওর চোয়ালে গুঁজে দিয়েছে
আর রক্তে ভেজা ওর সমস্ত দাঁত
ওর হাতের তালুতে এসে পড়েছে
মাঝরাতে জেগে উঠে
নিজের পা ছুঁয়ে দেখে
কোনো গুলি ঢুকে আছে নাকি?
এখন বার বার ওর এ রকম লাগে
ওই দিন চোট খেয়ে পড়ে যাওয়া
পালাতে না পারা আধমরা বিরসাকে দেখে কেমন
ওই লোকটা প্রথমে চারদিক দেখলো
আর কাউকে না দেখে চুপচাপ
তিনটে গুলি ঢুকিয়ে দিলো ওর বুকে
দ্বিতীয় বিরসা, যার পায়ে লেগেছিলো গুলি
ঝোপের মধ্যে চুপচাপ পড়ে রইলো শ্বাস বন্ধ করে
আজও কাগজের পুরিয়ার মধ্যে ওই গুলিটা লুকিয়ে
ও ঘুরে ঘুরে শ্রান্ত হয়ে দেখায়
দেখো, এই সেই প্রমাণ যা বলছে
যে আসলে কোনো গাঁয়ের ওপর
সবচেয়ে প্রথম গুলিটা কে চালায়।
মূল হিন্দি থেকে অনুবাদ ।। কল্যাণ সুলেখাপুত্ত
गाँव पर गोली कौन चलाता है
गाँव हर रात बिस्तर पर गिरता है
पर उसकी नींद के पास
अब कोई सपना नहीं है
सारे सपने बंधक बनाकर पिछली रात
जेल में डाल दिए गए हैं
सपनों के जहाँ भी उगने की थी सँभावनाएँ
वहाँ कुकुरमुत्ते की तरह उग आई हैं छावनियाँ
दिन और रात अजीब दहशत में हैं
गाँव का आदिवासी लड़का
देखता था सपने में कभी अपनी माटी की सेवा
जाग कर आधी रात को उठता है
अब सपने में उसे दिखती हैं हत्यारी बन्दूक़ें
अब उसकी नींदें भरी हैं
कई हादसों की यादों में
आधी रात को वह जगकर
अपना मुँह पोंछता है
रह-रहकर जैसे लगता है
कोई बन्दूक़ का कुंदा उसके जबड़े में धँसा है
और ख़ून से सने उसके सारे दाँत
उसकी हथेली में आ गिरे हैं
आधी रात को उठकर
अपना पैर छूकर देखता है
कोई गोली धँसी हुई है क्या?
अब ऐसा उसे बार-बार लगता है
उस दिन चोट खाकर गिरे
अधमरे बिरसा को
भागने में विफल देख कैसे
उस आदमी ने पहले चारों ओर देखा
और किसी को न देख चुपचाप
धँसा दी तीन गोलियाँ उसकी छाती में
दूसरा बिरसा जिसके पैर में लगी थी गोली
झाड़ी में वह पड़ा रहा चुप साँस रोककर
आज भी काग़ज़ की पुड़िया में
पैर से निकाली गई वही गोली छिपाकर
वह घूम-घूमकर बदहवास दिखाता है
देखो यह सबूत है जो बताता है
कि आख़िर किसी गाँव पर
सबसे पहले गोली कौन चलाता है?
[ कविता : आने वाले संग्रह "ईश्वर और बाज़ार" से,
राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली ]
© जसिंता केरकेट्टा




Comments